Baran // पहली बारिश में टपका करोड़ों से बना कलेक्ट्रेट, मरम्मत कार्य पर उठे सवाल

Baran – जिले के सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक भवन—जिला कलेक्ट्रेट—में करोड़ों रुपये खर्च कर कराए गए मरम्मत कार्य पहली ही बारिश में नाकाम साबित हो गए। मानसून की पहली तेज बारिश ने न केवल भवन की छतों की हकीकत उजागर कर दी, बल्कि निर्माण कार्य की गुणवत्ता, निगरानी व्यवस्था और करोड़ों रुपये की सीएसआर राशि के उपयोग पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थिति इतनी खराब हो गई कि अधिकारियों के चैंबरों और विभिन्न शाखाओं में छतों से लगातार पानी टपकने लगा। सरकारी फाइलों और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को भीगने से बचाने के लिए कर्मचारियों को कमरों के भीतर तिरपाल डालनी पड़ी। बताया जा रहा है कि कुछ ही समय पहले अदानी पावर प्लांट की कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) निधि से दो करोड़ रुपये से अधिक की लागत से कलेक्ट्रेट भवन की छतों, अधिकारियों के चैंबरों, गैलरियों एवं अन्य हिस्सों की मरम्मत कराई गई थी। लेकिन जिस कार्य को वर्षों तक टिकाऊ बनाने का दावा किया गया था, वह पहली ही बारिश में धराशायी होता नजर आया। जहां से पूरे जिले की निगरानी होती है, वहीं टपकने लगी छत जिला कलेक्ट्रेट वह स्थान है, जहां से पूरे जिले की प्रशासनिक व्यवस्था संचालित होती है। करोड़ों रुपये की विकास योजनाओं की समीक्षा, सरकारी बैठकों और जनसुनवाई का संचालन इसी भवन से होता है। लेकिन विडंबना यह है कि इसी भवन के कमरों में बारिश का पानी टपकने लगा। कई स्थानों पर छतों से लगातार रिसाव हुआ, गैलरियों में पानी भर गया और दीवारों पर सीलन उभर आई। कर्मचारियों ने मजबूरी में टेबलों पर तिरपाल डालकर रिकॉर्ड बचाए, जबकि कई स्थानों पर बाल्टियां और बर्तन रखकर पानी रोका गया। पहली बारिश ने खोल दी गुणवत्ता की परतें मरम्मत कार्य पूरा होने के कुछ ही समय बाद पहली बारिश में सामने आई यह तस्वीर कई सवाल छोड़ रही है। यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद छतें पानी नहीं रोक सकीं, तो आखिर निर्माण कार्य में किस स्तर की सामग्री का उपयोग हुआ? क्या कार्य केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए किया गया था या वास्तव में गुणवत्ता के मानकों का पालन किया गया?
Baran – निर्माण कार्य की तकनीकी स्वीकृति किसने दी? कार्य पूर्ण होने का प्रमाणपत्र किस आधार पर जारी हुआ? क्या संबंधित विभाग के इंजीनियरों ने स्थल पर गुणवत्ता परीक्षण किया था? यदि किया था तो फिर पहली ही बारिश में यह स्थिति क्यों बनी? CSR राशि के उपयोग पर भी उठे सवाल कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) का उद्देश्य उद्योग प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक विकास के कार्यों को बढ़ावा देना है। बारां जिले में अदानी पावर प्लांट से प्रभावित कवाई एवं आसपास के क्षेत्रों में आज भी अनेक मूलभूत समस्याएं बनी हुई हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि यदि सीएसआर राशि का उपयोग जिला मुख्यालय स्थित सरकारी भवन की मरम्मत में किया गया, तो क्या यह राशि अपने मूल उद्देश्य के अनुरूप खर्च हुई? अब जब उसी राशि से कराया गया कार्य पहली ही बारिश में विफल होता दिखाई दे रहा है, तो पूरे प्रकरण की पारदर्शिता और कार्य की गुणवत्ता दोनों पर प्रश्नचिह्न लग गए हैं। जवाबदेही किसकी? निर्माण कार्य के बाद संबंधित एजेंसी को भुगतान कैसे हुआ? क्या विभागीय इंजीनियरों ने कार्य का निरीक्षण किया? क्या गुणवत्ता परीक्षण की रिपोर्ट उपलब्ध है? यदि कार्य मानकों के अनुरूप था तो पहली बारिश में ही छतें क्यों टपकने लगीं? यदि कार्य मानकों के अनुरूप नहीं था, तो जिम्मेदार अधिकारियों और निर्माण एजेंसी के विरुद्ध अब तक क्या कार्रवाई हुई? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आमजन जानना चाहते हैं। जिले के लोगों में चर्चा का विषय बना मामला कलेक्ट्रेट परिसर की तस्वीरें सामने आने के बाद यह मामला जिलेभर में चर्चा का विषय बन गया है। लोगों का कहना है कि यदि जिले के सबसे महत्वपूर्ण सरकारी भवन में कराए गए कार्य का यह हाल है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में हुए निर्माण कार्यों की गुणवत्ता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। लोगों का यह भी कहना है कि विकास कार्यों में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना केवल कागजी प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी है। उच्चस्तरीय जांच की मांग सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने पूरे मामले की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराने, सीएसआर राशि के उपयोग का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक करने, निर्माण कार्य का थर्ड पार्टी ऑडिट कराने तथा यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो संबंधित निर्माण एजेंसी, तकनीकी अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की है।
बारां से राजेश कुमार मंगल की रिपोर्ट
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