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Baran // कालबेलिया समाज के मासूमों का दर्द: न शिक्षा, न राशन, भीख मांगने को मजबूर बचपन

Baran // सरकारी दावों की खुली पोल, कालबेलिया समाज के मासूम आज भी भीख मांगने को मजबूर

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Baran – सरकार बच्चों के उज्ज्वल भविष्य, शिक्षा, पोषण और सुरक्षा के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने के दावे करती है। महिला एवं बाल विकास विभाग, शिक्षा विभाग और सामाजिक न्याय से जुड़े विभाग नियमित रूप से योजनाओं की सफलता के आंकड़े पेश करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है। शहर और कस्बों के बाजारों में कालबेलिया समाज के छोटे-छोटे बच्चे भीख मांगते नजर आते हैं। जिन हाथों में किताबें और कॉपियां होनी चाहिए, वे हाथ राहगीरों के सामने मदद के लिए फैले हुए हैं। सबसे दर्दनाक बात यह है कि इन बच्चों के पास न माता-पिता का सहारा है और न ही सरकारी योजनाओं का लाभ। बच्चों ने बताया कि उनकी मां का निधन हो चुका है और पिता उन्हें छोड़कर कहीं अन्यत्र रहने लगे हैं। वे अपने वृद्ध दादा-दादी के साथ जीवन यापन कर रहे हैं। बुढ़ापे और बीमारी के कारण दादा-दादी मजदूरी या अन्य काम करने में असमर्थ हैं। ऐसे में परिवार के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा है और मासूम बच्चों को भीख मांगकर पेट भरने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। न आधार कार्ड, न राशन, न शिक्षा का अधिकार सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन बच्चों के आज तक आधार कार्ड तक नहीं बने हैं। आधार कार्ड नहीं होने के कारण वे स्कूलों में प्रवेश से वंचित हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं ले पा रहे। बच्चों का कहना है कि उन्हें न राशन मिलता है और न ही किसी प्रकार की आर्थिक सहायता। सवाल यह है कि जब सरकार जन्म पंजीकरण, आधार निर्माण, शिक्षा का अधिकार, पोषण अभियान और बाल संरक्षण जैसी योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, तो फिर ये बच्चे व्यवस्था की नजरों से कैसे ओझल रह गए? कागजों में विकास, जमीन पर बदहाल बचपन महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा नियमित रूप से बाल कल्याण, पोषण और शिक्षा को लेकर अभियान चलाने के दावे किए जाते हैं। अधिकारियों की बैठकों में योजनाओं की समीक्षा होती है, रिपोर्टें बनती हैं और उपलब्धियों के आंकड़े भेजे जाते हैं। लेकिन सड़कों पर भीख मांगते ये मासूम बच्चे उन तमाम दावों की सच्चाई उजागर कर रहे हैं।

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Baran – यदि विभागीय सर्वे और मॉनिटरिंग वास्तव में हो रही है, तो इन बच्चों की पहचान अब तक क्यों नहीं हुई? यदि योजनाएं प्रभावी हैं, तो इन तक उनका लाभ क्यों नहीं पहुंचा? आखिर किस स्तर पर लापरवाही हुई कि अनाथ और बेसहारा बच्चे आज भी सरकारी सहायता से वंचित हैं? प्रशासन और विभागों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल यह मामला केवल गरीबी का नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता और लापरवाही का भी प्रतीक है। जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने की है, वे यदि केवल कागजों में उपलब्धियां दिखाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान रहे हैं, तो यह व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है। अब जवाब चाहिए, आश्वासन नहीं प्रशासन को चाहिए कि तत्काल विशेष अभियान चलाकर इन बच्चों के आधार कार्ड बनवाए जाएं, राशन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ा जाए, स्कूलों में प्रवेश सुनिश्चित किया जाए तथा उनकी संपूर्ण पारिवारिक स्थिति का सर्वे कर स्थायी सहायता उपलब्ध कराई जाए। साथ ही यह भी जांच होनी चाहिए कि आखिर वर्षों से ये बच्चे सरकारी रिकॉर्ड और विभागीय निगरानी से बाहर कैसे रहे। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या उदासीनता सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई भी सुनिश्चित होनी चाहिए। मासूमों की पुकार ये बच्चे किसी सरकारी फाइल का आंकड़ा नहीं, बल्कि इस देश का भविष्य हैं। यदि उनका बचपन सड़कों पर भीख मांगते हुए गुजर रहा है, तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे तंत्र के लिए शर्म का विषय है। जब तक कालबेलिया समाज के ये मासूम बच्चे भीख के सहारे जीवन जीने को मजबूर हैं, तब तक सरकारी योजनाओं की सफलता के दावे खोखले ही माने जाएंगे। प्रशासन को अब कागजों से बाहर निकलकर इन बच्चों की जिंदगी में वास्तविक बदलाव लाना होगा।

बारां से राजेश कुमार मंगल की रिपोर्ट

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