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Beawar // धन नहीं, पुण्य जाता है साथ: आचार्य विहर्ष सागर जी ने बताया दान और धर्म का महत्व

Beawar // धन नहीं, केवल पुण्य कर्म जाते हैं साथ; आचार्य विहर्ष सागर जी ने बताया दान का महत्व

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Beawar – श्री दिगम्बर जैन पंचायती नसिया जी, सूरजपोल गेट बाहर में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आचार्य श्री 108 विहर्ष सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि जीवित व्यक्ति को धनवान कहा जाता है, लेकिन जब उसका देहांत हो जाता है तो लोग कहते हैं कि उसका “निधन” हो गया, अर्थात वह धन से रहित हो गया। इससे स्पष्ट है कि धन व्यक्ति के साथ नहीं जाता, केवल उसके द्वारा किए गए पुण्य कर्म ही उसके साथ जाते हैं। आचार्य श्री ने कहा कि शास्त्रों में धन की तीन गतियां बताई गई हैं—दान, भोग और नाश। धन का सदुपयोग अपने परिवार, आवश्यकताओं एवं लोककल्याण के कार्यों में करना चाहिए। भोग का अर्थ है धन का उचित उपयोग अपने जीवन एवं परिवार के पालन-पोषण में करना, जबकि दान का अर्थ है धर्म, सेवा एवं पुण्य के कार्यों में धन का विनियोग करना। यदि धन का सदुपयोग नहीं किया जाता तो अंततः उसकी तीसरी गति नाश ही होती है। उन्होंने कहा कि धार्मिक कार्यों में किया गया दान कभी व्यर्थ नहीं जाता। दान एक ऐसे आध्यात्मिक बैंक की तरह है, जिसका प्रतिफल निश्चित रूप से प्राप्त होता है। दान का फल केवल इस भव में ही नहीं, बल्कि आने वाले भवों में भी प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य को अपने धन का एक अंश सदैव धर्म एवं परोपकार के कार्यों में लगाना चाहिए। आचार्य श्री ने कहा कि खाने से अधिक महत्व खिलाने का है। स्वयं भोजन करने से केवल अपनी तृप्ति होती है, लेकिन किसी अन्य को भोजन कराने से धर्म की प्रभावना होती है और पुण्य का संचय होता है। उन्होंने कहा कि कई बार लोग मंदिर में चढ़ाने के लिए निम्न स्तर की सामग्री का उपयोग करते हैं, जबकि अपने लिए श्रेष्ठ वस्तुओं का चयन करते हैं। जैसा भाव और जैसी श्रद्धा होगी, वैसा ही पुण्य प्राप्त होगा। इसलिए भगवान और धर्म के कार्यों में सदैव श्रेष्ठ भावना और श्रेष्ठ सामग्री का उपयोग करना चाहिए।

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Beawar – प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने आगामी श्रुतस्कंध विधान की महत्ता बताते हुए श्रद्धालुओं से इसमें बढ़-चढ़कर भाग लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि श्रुतज्ञान की आराधना आत्मकल्याण का श्रेष्ठ साधन है। श्रुतस्कंध विधान में सहभागिता करने से धर्म लाभ, पुण्य संचय एवं आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। इसका लाभ वर्तमान जीवन में भी प्राप्त होता है और भविष्य के भवों में भी कल्याणकारी परिणाम देता है। इस अवसर पर आचार्य श्री के शिष्य मुनि श्री विजयेश सागर जी महाराज ने भी श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए श्रुतस्कंध विधान की महिमा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जिनवाणी ही मोक्षमार्ग की सच्ची मार्गदर्शक है। श्रुतज्ञान के प्रति श्रद्धा और अध्ययन से जीवन में विवेक, संयम और धर्म की भावना विकसित होती है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से विधान में सहभागिता कर धर्म लाभ प्राप्त करने का आह्वान किया। दिगम्बर जैन पंचायत के अध्यक्ष सुशील बड़जात्या एवं मंत्री रितेश फागीवाला ने बताया कि परम पूज्य आचार्य श्री 108 विहर्ष सागर जी महाराज के मंगल सान्निध्य में 17 एवं 18 जून को श्रुतस्कंध विधान का भव्य आयोजन किया जा रहा है। समाज के सभी वर्गों में इस आयोजन को लेकर उत्साह का वातावरण है तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसमें भाग लेकर धर्म लाभ प्राप्त कर रहे हैं। प्रवक्ता राकेश जैन ने बताया कि धर्मसभा में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होकर आचार्य श्री एवं मुनि संघ के प्रवचनों का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। समाज द्वारा सभी श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं की जा रही हैं तथा विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम निरंतर आयोजित किए जा रहे हैं।

ब्यावर से शम्भू दयाल व्यास की रिपोर्ट

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