Tonk // पीताम्बरा पीठ में गुरुदेव राजकुमार शर्मा ने की राष्ट्र समृद्धि और विश्व कल्याण की प्रार्थना

Tonk – भारत की सनातन संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और ऋषि परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से सद्गुरु आश्रम टोंक के संस्थापक, प्रख्यात ज्योतिषाचार्य एवं सनातन धर्म प्रचारक गुरुदेव पंडित राजकुमार शर्मा ने मध्यप्रदेश के दतिया स्थित सिद्ध शक्तिपीठ पीताम्बरा पीठ माँ बगलामुखी मंदिर तथा ग्वालियर के डबरा स्थित विख्यात नवग्रह मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना कर राष्ट्र की सुख-समृद्धि, अखंडता, सांस्कृतिक उन्नति एवं विश्व कल्याण की कामना की। सनातन धर्म में माँ बगलामुखी को धर्म की रक्षा करने वाली, अधर्म का नाश करने वाली तथा भक्तों को साहस, शक्ति और विजय प्रदान करने वाली आदिशक्ति के रूप में पूजा जाता है। वर्ष 1935 में स्वामी जी महाराज द्वारा स्थापित यह दिव्य शक्तिपीठ आज देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है। गुरुदेव ने विधि-विधान से पूजा कर भारत की प्रगति, सामाजिक समरसता और मानवता के कल्याण के लिए प्रार्थना की। इसके उपरांत गुरुदेव ने डबरा स्थित एशिया के प्रसिद्ध एवं अद्भुत नवग्रह मंदिर में नवग्रह देवताओं के समक्ष विशेष अनुष्ठान संपन्न किया। लगभग 12 एकड़ क्षेत्र में निर्मित इस अनूठे मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ नवग्रह देवताओं के साथ उनकी पत्नियाँ भी विराजमान हैं। गुरुदेव ने देश में शांति, सकारात्मक ऊर्जा, समृद्धि और जनकल्याण की मंगलकामना करते हुए नवग्रहों का आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर गुरुदेव पंडित राजकुमार शर्मा ने कहा कि सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश देने वाली दिव्य जीवन शैली है। भारत की महान ऋषि परंपरा, वेदों का अमूल्य ज्ञान, संत-महात्माओं का त्याग, तपस्या और लोकमंगल की भावना ही भारतीय संस्कृति की वास्तविक पहचान है। यही आध्यात्मिक विरासत भारत को विश्व में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।

Tonk – उन्होंने कहा कि संत-महात्माओं ने सदियों से तप, साधना और त्याग के माध्यम से समाज को धर्म, सदाचार और मानव सेवा का मार्ग दिखाया है। उनके आदर्शों पर चलकर ही राष्ट्र में नैतिक मूल्यों, सामाजिक एकता और आध्यात्मिक जागरण को सुदृढ़ किया जा सकता है। गुरुदेव ने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि वे भारतीय संस्कृति, संस्कारों, धर्म और आध्यात्मिक मूल्यों को आत्मसात कर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएँ। आध्यात्मिक चेतना, राष्ट्रभक्ति और नैतिक मूल्यों का समन्वय ही आत्मनिर्भर, समृद्ध और शक्तिशाली भारत के निर्माण का आधार है। उन्होंने कहा, “राष्ट्र सर्वोपरि है और सनातन संस्कृति उसकी आत्मा। भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को एकजुट होकर राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक गौरव, आध्यात्मिक मूल्यों और मानव कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होना होगा। जब तक हम अपनी संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों से जुड़े रहेंगे, तब तक भारत की गौरवशाली पहचान विश्व मंच पर सदैव अक्षुण्ण बनी रहेगी।” गुरुदेव ने अंत में ईश्वर से प्रार्थना की कि सम्पूर्ण विश्व में शांति, सद्भाव, धर्म, करुणा और मानवता का प्रकाश फैले तथा भारत अपनी सनातन आध्यात्मिक शक्ति के बल पर विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता रहे।
टोंक से अशोक शर्मा की रिपोर्ट
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